माइटोकॉन्ड्रिया(सूत्रकणिका)
*माइटोकॉन्ड्रिया की खोज कोलिकट ने कीट की रेखित पेशी कोशिका में की थी।
*अल्टमान ने इसे बायोप्लास्ट नाम दिया।
*सी-बैंडा ने इसे माइटोकॉन्ड्रिया नाम दिया।
*माइटोकॉन्ड्रिया को विशेष रूप से अभी रंजीत करने पर ही यह सूक्ष्मदर्शी द्वारा दिखाई देता है।
*प्रत्येक कोशिका में सूत्रकणिका की संख्या भिन्न होती है।
*इनकी संख्या 50 से 5000 तक हो सकती है।
* माइटोकॉन्ड्रिया का जीवनकाल 5 से 10 दिन होता है।
* माइटोकॉन्ड्रिया कोशिका द्रव्य में विखंडन द्वारा विभाजित होकर नयी माइटोकॉन्ड्रिया बनाती है।
* अतः इसे अर्ध स्वायक अर्ध अंगक भी कभी कहते हैं।
* माइटोकॉन्ड्रिया सामान्यतः तश्तरी नुमा या बेलनाकार आकृति की होती है।
* जिसकी लंबाई 1-4.5 माइक्रोमीटर तथा व्यास 0.2 से 1 माइक्रोमीटर होता है।
* माइटोकॉन्ड्रिया दोहरी दिल्ली से ढका हुआ कोशिका अंगक है।
* बाहरी आंतरिक झिल्ली के मध्य उपस्थित अवकाश को पेरीमाइट्रो कोडरियल स्पेस कहते हैं।
*इसमें श्वसन संबंधी एंजाइम भरे होते हैं यह बाह्य कक्ष होता है।
* माइटोकॉन्ड्रिया का आंतरिक कक्ष अतः झिल्ली से आवृत होता है।
*इसके आंतरिक कक्ष में मैट्रिक्स पाई जाती है।
*माइटोकॉन्ड्रिया की आंतरिक झिल्ली आधात्री में अंगुली सम्मान वलन बनाकर धसी होती है इनको क्रिस्टि कहते हैं।
* कृष्टि के कारण आंतरिक झिल्ली का क्षेत्रफल बढ़ जाता है।
* माइटोकॉन्ड्रिया की आंतरिक झिल्ली पर टेनिस के आकार के समान कण पाए जाते हैं जिन्हें f1 कण या ऑक्सी -सॉम कहते हैं।
* इसमें एटिपेज एंजाइम होता है जो ATP का निर्माण करता है।
* माइटोकॉन्ड्रिया के मैट्रिक्स में वृत्ताकार DNA अणु 70s राइबोसोम RNA व प्रोटीन संश्लेषण के लिए आवश्यक पदार्थ पाए जाते हैं।
*माइटोकॉन्ड्रिया में अपना स्वयं का अपना ही डीएनए होता है।
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